YC न्यूज़ डेस्क । 18 अप्रैल 2025 से भारत में एक ऐतिहासिक सामाजिक क्रांति — भूदान आंदोलन — के 75वें वर्ष का अमृत महोत्सव शुरू हुआ है। यह वर्ष महज़ स्मरण नहीं, बल्कि उस क्रांति की पुनः प्रासंगिकता का संदेश है जिसने भारत के लाखों भूमिहीनों को सम्मान और ज़मीन दी थी।
1951 में तेलंगाना के नलगोंडा ज़िले के पोचमपल्ली गांव से महात्मा गांधी के शिष्य आचार्य विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन की शुरुआत की। जब दलितों ने थोड़ी ज़मीन की मांग की, तो विनोबा ने गांववालों से कहा, “अगर सरकार नहीं देती, तो क्या आप देंगे?” और जवाब में रामचंद्र रेड्डी जैसे जमींदारों ने खुले दिल से ज़मीन दान की। इसके बाद 19 अप्रैल 1951 को विनोबा भावे ने कहा, “मुझे फूल नहीं चाहिए, मुझे ज़मीन दीजिए,” और उस दिन उनकी झोली में 90 एकड़ भूमि समर्पित हुई।
विनोबा ने 13 वर्षों तक 58,741 किमी पदयात्रा की, और 44 लाख एकड़ भूमि प्राप्त कर 13 लाख भूमिहीनों को बाँटी। यह आंदोलन मंगरौठ जैसे ग्रामदान गांवों तक पहुँचा, जहाँ entire गांवों ने अपनी ज़मीन समाज को समर्पित कर दी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विनोबा भावे को श्रद्धांजलि देते हुए कहा था —
“आचार्य विनोबा भावे केवल एक समाज सुधारक नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की आवाज़ थे। उनका भूदान यज्ञ समाज को जोड़ने का एक अनुपम उदाहरण है, जिसमें सेवा, करुणा और समानता का भाव निहित था। आज उनके आदर्शों को अपनाना और भी जरूरी हो गया है।”
आज जब देश एक बार फिर असमानता, बेरोजगारी और सामाजिक विघटन से जूझ रहा है, तब विनोबा भावे का यह यज्ञ हमें रास्ता दिखा सकता है। सवाल है — क्या हम एक और विनोबा बनने को तैयार हैं?