खारुन तट पर विराजित मां महामाया का दरबार, तरीघाट में स्वयंभू त्रिमूर्ति के दर्शन के लिए उमड़ते हैं श्रद्धालु,नागदेवता को मंदिर का रक्षक मानते हैं ग्रामीण, नवरात्रि में ज्योति कलश स्थापना से भक्तिमय है माहौल

खारुन तट पर विराजित मां महामाया का दरबार, तरीघाट में स्वयंभू त्रिमूर्ति के दर्शन के लिए उमड़ते हैं श्रद्धालु,नागदेवता को मंदिर का रक्षक मानते हैं ग्रामीण, नवरात्रि में ज्योति कलश स्थापना से भक्तिमय है माहौल

मुकेश सेन/पाटन। दुर्ग जिले के पाटन विकासखंड में खारुन नदी के किनारे बसे ऐतिहासिक गांव तरीघाट की पहचान प्राचीन मां महामाया मंदिर से भी जुड़ी है। वर्षों से यह मंदिर क्षेत्र के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। स्थानीय मान्यता है कि सच्चे मन से माता के दरबार में आने वाले भक्तों को संबल और मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद मिलता है। यही वजह है कि ग्रामीण सुख-दुख, शुभ कार्यों और विशेष अवसरों पर माता का स्मरण कर आशीर्वाद लेते हैं।

एक ही स्थान पर तीन देवियों की त्रिमूर्ति

मां महामाया मंदिर की प्रमुख विशेषता यहां मां महामाया, मां महालक्ष्मी और मां महासरस्वती की त्रिमूर्ति का विराजमान होना है। स्थानीय श्रद्धालु इसे स्वयंभू मानते हैं। धार्मिक मान्यताओं में मां महामाया शक्ति, मां महालक्ष्मी धन-समृद्धि और मां महासरस्वती ज्ञान एवं विद्या की प्रतीक मानी जाती हैं। भक्त तीनों स्वरूपों का दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना करते हैं।

नागदेवता को मंदिर का रक्षक मानते हैं ग्रामीण

मंदिर के गुंबद पर उकेरी गई नागदेवता की आकृति भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। ग्रामीण नागदेवता को मंदिर का रक्षक मानते हैं। स्थानीय जनश्रुतियों में विशेष अवसरों पर नागदेवता के दर्शन होने से जुड़ी कथाएं भी प्रचलित हैं। ये मान्यताएं पीढ़ियों से गांव की धार्मिक परंपरा और लोकसंस्कृति का हिस्सा बनी हुई हैं।

नवरात्रि में ज्योति कलश स्थापना, गूंजते हैं जयकारे

चैत्र और क्वार नवरात्रि के अवसर पर मंदिर में ज्योति कलश स्थापना और विशेष पूजा-अर्चना की परंपरा निभाई जाती है। इन दिनों मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण रहता है। श्रद्धालु नारियल, पुष्प और पूजन सामग्री अर्पित कर माता के समक्ष शीश नवाते हैं। आसपास के गांवों से भी भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं और परिवार के आरोग्य, सुख-शांति एवं समृद्धि की कामना करते हैं।

धार्मिक आस्था के साथ ऐतिहासिक विरासत भी

खारुन नदी के तट पर स्थित तरीघाट अपनी पुरातात्विक और ऐतिहासिक पहचान के लिए भी जाना जाता है। मां महामाया मंदिर इस क्षेत्र की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मंदिर के निर्माण में काले पत्थरों के इस्तेमाल और इसकी प्राचीनता को लेकर स्थानीय स्तर पर चर्चाएं होती रही हैं। मंदिर के निर्माणकाल और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को प्रमाणिक रूप से सामने लाने के लिए पुरातात्विक साक्ष्यों, पुराने अभिलेखों और स्थानीय जानकारियों का अध्ययन आवश्यक है।

विरासत के संरक्षण की जरूरत

मां महामाया मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि तरीघाट की सामाजिक स्मृति, लोकविश्वास और सांस्कृतिक परंपराओं का भी प्रतीक है। मंदिर से जुड़ी त्रिमूर्ति की मान्यता, नागदेवता की जनश्रुतियों और नवरात्रि की परंपराओं का दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए। साथ ही, मंदिर परिसर की स्वच्छता, श्रद्धालुओं के लिए जरूरी सुविधाओं और ऐतिहासिक पहचान के संरक्षण पर ध्यान देने से इस धार्मिक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाया जा सकता है।

आस्था, विश्वास और परंपरा का संगम मां महामाया मंदिर आज भी तरीघाट की पहचान बना हुआ है। माता के प्रति ग्रामीणों की अटूट श्रद्धा और नवरात्रि में उमंग के साथ होने वाली पूजा-अर्चना इस बात का प्रमाण है कि बदलते समय के बावजूद गांव की धार्मिक परंपराएं लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।

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