रायपुर। छत्तीसगढ़ में नया शिक्षा सत्र 16 जून से भले ही औपचारिक रूप से शुरू हो चुका हो, लेकिन स्कूलों में किताबों की भारी कमी ने शिक्षा विभाग और शासन-प्रशासन की तैयारियों की पोल खोलकर रख दी है। 46 हजार से अधिक शासकीय स्कूलों में पढ़ने वाले 56 लाख से अधिक बच्चे किताबों के बिना ही स्कूल जाने को मजबूर हैं। शासन की लापरवाही और सुस्त कार्यशैली के चलते बच्चों की पढ़ाई की गाड़ी पटरी से उतर गई है। बिना किताबों के शाला प्रवेश उत्सव महज औपचारिकता बनकर रह गया है । आखिर कब तक बच्चे खाली बैग लेकर स्कूल जाते रहेंगे, यह सवाल अब शासन के गले की हड्डी बनता जा रहा है।
आलम यह है कि कई जिलों में किताबों का वितरण शून्य है। दंतेवाड़ा, दुर्ग, गरियाबंद, कांकेर, कवर्धा, नारायणपुर और सुकमा में एक भी किताब नहीं बंटी है। बलरामपुर में महज 4 फीसदी, कोंडागांव में 5 फीसदी और खैरागढ़ में केवल 1 फीसदी किताबें पहुंच पाई हैं। मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी में भी स्थिति गंभीर है जहां महज 6 फीसदी वितरण हुआ है। हाईस्कूलों की हालत और भी बदतर है। कई जिलों में तो खाता ही नहीं खुला। दंतेवाड़ा, बीजापुर और मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जैसे जिलों में हाईस्कूल स्तर पर शून्य वितरण दर्ज किया गया है।
शिक्षक संघ और निजी स्कूल संगठनों ने सरकार पर तीखा प्रहार किया है। शाला शिक्षक संघ के अध्यक्ष वीरेंद्र दूबे ने कहा कि किताबें नहीं हैं तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बातें केवल दिखावा हैं। प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने तंज कसते हुए कहा, “स्कूल प्रवेश उत्सव पर बच्चों को तिलक लगाकर खाली हाथ लौटाना क्या शिक्षा महोत्सव कहलाएगा?”
घपलों की गूंज, सेटिंग का खेल:
पैरेंट्स एसोसिएशन ने पाठ्यपुस्तक निगम और प्राइवेट प्रकाशकों की मिलीभगत पर सवाल उठाए हैं। आरोप है कि हर साल जानबूझकर किताबों की कमी का खेल रचा जाता है ताकि प्राइवेट किताबें बिक सकें। बीते वर्ष सरकारी किताबों के कबाड़ में बिकने का मामला सामने आया था, लेकिन दोषियों पर सख्त कार्रवाई न होने से गड़बड़ियों के हौसले बुलंद हैं।