
क्रांति के नाम पर छल-दशकों तक कैसे बेचे गए माओवाद के झूठ
YC न्यूज़ डेस्क। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में कुछ संघर्ष ऐसे रहे हैं, जिन्हें केवल बंदूक की लड़ाई कहकर नहीं समझा जा सकता। वे विचारों, भावनाओं और नैरेटिव की लड़ाई भी रहे हैं। बस्तर से लेकर झारखंड तक फैली माओवादी हिंसा भी ऐसी ही एक लड़ाई थी, जहां गोलियों से पहले शब्दों का इस्तेमाल हुआ और बारूद से पहले भावनाओं को हथियार बनाया गया। दशकों तक एक नैरेटिव गढ़ा गया कि नक्सली “जल, जंगल और जमीन” के रक्षक हैं। उन्हें जनजातीय समाज का हितैषी, शोषण के खिलाफ खड़े “क्रांतिकारी” और व्यवस्था विरोधी संघर्ष का प्रतीक बताया गया। विश्वविद्यालयों, साहित्यिक मंचों, कुछ मीडिया समूहों और वैचारिक संगठनों के जरिए यह धारणा बनाई गई कि जंगलों में चल रही हिंसा दरअसल “जनता की लड़ाई” है। लेकिन समय के साथ यह प्रश्न और गहरा होता गया कि क्या सचमुच यह संघर्ष जनजातीय अधिकारों के लिए था, या फिर यह सत्ता परिवर्तन की एक सुनियोजित वैचारिक रणनीति थी?
माओवादी विचारधारा की जड़ें चीनी कम्युनिस्ट नेता माओ त्से तुंग के उस सिद्धांत में मिलती हैं, जिसमें “गांवों से शहरों की घेराबंदी” के जरिए सत्ता परिवर्तन की बात कही गई। इस रणनीति को भारत की जनजातीय संवेदनाओं के साथ जोड़ा गया। आदिवासी समाज की जमीन, जंगल और संस्कृति के प्रति स्वाभाविक जुड़ाव को वैचारिक ढाल बनाकर उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि सरकार और विकास परियोजनाएं उनकी पहचान छीनने आई हैं।
यही वह मोड़ था, जहां नैरेटिव ने वास्तविकता को पीछे छोड़ दिया।
यदि माओवादी वास्तव में जनहितैषी होते, तो स्कूल, सड़क, अस्पताल, मोबाइल टावर और पेयजल योजनाएं उनके निशाने पर नहीं होतीं। लेकिन बस्तर इसका गवाह रहा कि विकास कार्यों को रोकना, जनअदालतों के नाम पर निर्दोष ग्रामीणों की हत्या करना, लेवी वसूलना और ग्रामीणों को मानव ढाल की तरह इस्तेमाल करना उनकी रणनीति का हिस्सा था।
“क्रांति” के नाम पर खून बहा, लेकिन सबसे अधिक पीड़ा उन्हीं जनजातीय परिवारों ने झेली, जिनके अधिकारों की रक्षा का दावा किया जा रहा था।
इस पूरे दौर में लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करना भी एक बड़ा हथियार बना। सुरक्षा बलों को “दमनकारी”, न्याय व्यवस्था को “पूंजीपतियों की एजेंट” और विकास को “विनाश” बताने की कोशिशें लगातार होती रहीं। परिणाम यह हुआ कि जंगलों में बंदूक और शहरों में बौद्धिक समर्थन — दोनों समानांतर चलते रहे।
हालांकि अब तस्वीर बदल रही है।
बस्तर में सड़कें पहुंच रही हैं, स्कूल खुल रहे हैं, युवा सेना और खेलों में आगे बढ़ रहे हैं, गांवों तक मोबाइल नेटवर्क और स्वास्थ्य सेवाएं पहुंच रही हैं। सबसे बड़ी बात यह कि अब जनजातीय समाज लोकतंत्र और विकास की मुख्यधारा से खुद को जोड़कर देख रहा है। यही कारण है कि माओवाद का वह पुराना नैरेटिव धीरे-धीरे कमजोर पड़ा है।
लेकिन चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। आज भी सोशल मीडिया और वैचारिक मंचों पर नए रूपों में भ्रम फैलाने की कोशिशें जारी हैं। इसलिए जरूरत केवल सुरक्षा अभियान की नहीं, बल्कि तथ्य आधारित संवाद, जनजागरण और सकारात्मक नैरेटिव की भी है।
क्योंकि इतिहास गवाह है — बंदूकें केवल शरीरों को घायल करती हैं, लेकिन झूठे नैरेटिव पीढ़ियों के विश्वास को प्रभावित कर देते हैं। और शायद यही कारण है कि आज की सबसे बड़ी लड़ाई जंगलों में नहीं, बल्कि विचारों के भीतर लड़ी जा रही है।