मनीष चंद्राकर @ YC न्यूज़ डेस्क। ओडिशा के एक सुदूर आदिवासी गांव से आई यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि हमारे समय का सबसे कड़ा प्रश्न है। जीतू मुंडा—एक साधारण, गरीब आदिवासी—अपनी बहन कालरा की मौत के बाद बैंक पहुंचता है, इस उम्मीद में कि उसके खाते में जमा 19,300 रुपये मिल जाएंगे। लेकिन उसे बताया जाता है—“खाताधारक को खुद लाओ, या फिर डेथ सर्टिफिकेट और वारिस का कागज़ लाओ।”
यह संवाद महज़ नियमों का पालन नहीं, बल्कि संवेदनहीनता का चरम है। और फिर जो हुआ, वह इस व्यवस्था पर एक ऐसा तमाचा है जिसकी गूंज लंबे समय तक सुनाई देगी। जीतू ने सचमुच अपनी बहन की कब्र खोदी, हड्डियों को बोरी में भरा, और पांच किलोमीटर पैदल चलकर बैंक पहुंच गया—“लो, खाताधारक हाजिर है।” यह दृश्य किसी फिल्म का नहीं, हमारे लोकतंत्र की हकीकत का है।
डिजिटल इंडिया बनाम ज़मीनी सच्चाई
हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां “डिजिटल इंडिया” का सपना हर मंच से दोहराया जाता है। आधार कार्ड से लेकर बैंक खाते तक, हर व्यक्ति की पहचान एक नंबर में समेट दी गई है। जन्म से लेकर मृत्यु तक, हर जानकारी लिंक करने का दावा किया जाता है।
फिर भी सवाल खड़ा होता है—
अगर एक व्यक्ति की सारी जानकारी पहले से सिस्टम में मौजूद है, तो उसकी मौत दर्ज करने के लिए उसके परिजन को दफ्तर-दफ्तर क्यों भटकना पड़ता है? पोलियो अभियान में सरकार घर-घर जाकर पूछ सकती है कि बच्चा पैदा हुआ या नहीं। राशन कार्ड के लिए परिवार के हर सदस्य का ब्योरा लिया जा सकता है। चुनाव के समय वोटर लिस्ट अपडेट करने के लिए कर्मचारी हर गली-मोहल्ले में पहुंच सकते हैं।
तो क्या मौत इतनी “गैर-जरूरी” सूचना है कि उसे दर्ज करने के लिए कोई सक्रिय व्यवस्था नहीं?
नियम बनाम इंसानियत
नियम किसी भी व्यवस्था की रीढ़ होते हैं, लेकिन जब वही नियम इंसानियत पर भारी पड़ने लगें, तो वे व्यवस्था नहीं, बोझ बन जाते हैं। बैंक कर्मचारी ने शायद नियमों का पालन किया होगा। लेकिन क्या व्यवस्था का उद्देश्य सिर्फ नियमों का पालन है, या नागरिकों की सहायता भी? क्या एक गरीब, अशिक्षित व्यक्ति से यह उम्मीद करना कि वह डेथ सर्टिफिकेट और कानूनी वारिस का प्रमाण लेकर आए—न्यायसंगत है?
या यह मान लेना चाहिए कि सिस्टम इस तरह बनाया ही गया है कि जो सबसे कमजोर है, वही सबसे ज्यादा परेशान हो?
मौत का डेटा और सत्ता का गणित
यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि हमारे देश में डेटा का महत्व अक्सर उसके “उपयोग” से तय होता है।
जाति का डेटा चाहिए—क्योंकि चुनाव में काम आता है।
गरीबी का डेटा चाहिए—क्योंकि योजनाओं में दिखता है।
वोटर का डेटा चाहिए—क्योंकि सत्ता उससे बनती है।
लेकिन जब एक गरीब मर जाता है, तो वह डेटा नहीं, “फाइल” बन जाता है—एक ऐसी फाइल जो दफ्तरों में पेंडिंग रहती है।
व्यवस्था की विफलता या संवेदना की कमी?
यह सवाल सिर्फ प्रशासनिक नहीं, नैतिक भी है। क्या हर गांव में मौजूद सरपंच, सचिव, पटवारी या आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की यह जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए कि वे अपने क्षेत्र में होने वाली मौतों का रिकॉर्ड रखें? क्या श्मशान घाट या कब्रिस्तान के रजिस्टर को डिजिटल सिस्टम से जोड़ना इतना कठिन है?
या फिर असली समस्या तकनीक की नहीं, इच्छाशक्ति और संवेदनशीलता की है?
अंतिम सवाल
जीतू मुंडा की यह कहानी हमें झकझोरती है, क्योंकि यह सिर्फ एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जिसमें हम सब जी रहे हैं। हम एक ऐसे देश में खड़े हैं जहां एक क्लिक पर लोन मिल सकता है, एक OTP से पैसे ट्रांसफर हो सकते हैं, लेकिन एक गरीब की मौत को दर्ज करने के लिए उसे कब्र खोदनी पड़ती है।
यह घटना हमें मजबूर करती है पूछने के लिए—
क्या हम सच में “डिजिटल इंडिया” बन रहे हैं, या सिर्फ “डिजिटल दिखावा”?
क्योंकि अगर किसी नागरिक को अपनी बहन की हड्डियां कंधे पर लादकर सिस्टम को “साबित” करना पड़े कि वह मर चुकी है, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की हार नहीं, पूरे लोकतंत्र की विफलता है।