गुमनाम विशेषज्ञ, पश्चिमी फंडिंग और भारत की रैंकिंग… कितना निष्पक्ष है प्रेस फ्रीडम इंडेक्स ?

प्रेस स्वतंत्रता की आड़ में नैरेटिव की राजनीति–संपादकीय मनोज श्रीवास्तव
YC न्यूज़ डेस्क। दुनिया में किसी भी लोकतंत्र की मजबूती का सबसे बड़ा पैमाना उसकी प्रेस की स्वतंत्रता को माना जाता है। यही कारण है कि जब भी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक जारी होता है, भारत सहित अनेक देशों की रैंकिंग को लेकर बहस तेज हो जाती है। लेकिन सवाल यह है कि जिस सूचकांक को आधार बनाकर किसी देश की लोकतांत्रिक छवि तय की जा रही है, क्या स्वयं उसकी कार्यप्रणाली उतनी ही स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी है जितना वह दावा करता है?
दरअसल, “प्रेस फ्रीडम इंडेक्स” आज केवल पत्रकारिता का आकलन नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक नैरेटिव गढ़ने का एक औजार बन चुका है। भारत जैसे उभरते और स्वतंत्र नीति वाले देशों के खिलाफ इसका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय विमर्श में लगातार बढ़ा है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि इस सूचकांक की विश्वसनीयता, उसकी पद्धति और उसके वैचारिक आधार की गंभीर समीक्षा की जाए।
यह सूचकांक तैयार करता है फ्रांस स्थित गैर-सरकारी संगठन Reporters Without Borders (RSF)। यह संस्था हर वर्ष 180 देशों की रैंकिंग जारी करती है और दावा करती है कि वह प्रेस की स्वतंत्रता का निष्पक्ष मूल्यांकन करती है। लेकिन जब इसकी वित्तीय संरचना पर नजर डालते हैं तो कई प्रश्न खड़े होते हैं। संस्था के बजट का बड़ा हिस्सा यूरोपीय सरकारी संस्थाओं और पश्चिमी विचारधारा से जुड़े फाउंडेशनों से आता है। ऐसे में यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या पूरी तरह पश्चिमी फंडिंग से संचालित संस्था वास्तव में वैचारिक रूप से तटस्थ रह सकती है?
सबसे बड़ी समस्या इसकी कार्यप्रणाली में दिखाई देती है। किसी देश की प्रेस स्वतंत्रता का मूल्यांकन वस्तुनिष्ठ आंकड़ों के बजाय मुख्यतः “धारणाओं” और “विशेषज्ञों की राय” पर आधारित है। लगभग 150 उत्तरदाताओं और कुछ चुनिंदा संगठनों के मत के आधार पर पूरे देश की मीडिया स्थिति निर्धारित कर दी जाती है। यह भी सार्वजनिक नहीं किया जाता कि कौन विशेषज्ञ हैं, उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि क्या है, वे किस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनकी चयन प्रक्रिया क्या रही।
यह स्थिति किसी लोकतांत्रिक मूल्यांकन से अधिक एक बंद कमरे में तैयार किए गए निष्कर्ष जैसी प्रतीत होती है। यदि मूल्यांकन का आधार ही अपारदर्शी हो, तो परिणामों की विश्वसनीयता स्वतः संदिग्ध हो जाती है।
विडंबना यह भी है कि जिन देशों में मीडिया पर प्रत्यक्ष सरकारी नियंत्रण है या जहाँ सत्ता की आलोचना अपराध मानी जाती है, वे कई बार भारत से बेहतर रैंक हासिल कर लेते हैं। कतर, रवांडा या कुछ अन्य देशों में पत्रकारिता की स्वतंत्रता सीमित होने के बावजूद उन्हें अपेक्षाकृत बेहतर स्थान मिलना यह दर्शाता है कि यह सूचकांक “शोर” को स्वतंत्रता का पैमाना मानता है। जहाँ मीडिया का प्रतिरोध दिखता है, वहाँ नकारात्मक अंकन होता है; और जहाँ असहमति की आवाज़ ही दबा दी गई हो, वहाँ “स्थिरता” को स्वतंत्रता समझ लिया जाता है।
भारत के संदर्भ में यह पूर्वाग्रह और स्पष्ट दिखाई देता है। जब भारत ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को जवाबदेह बनाने के लिए IT नियम लागू किए, तब RSF ने उन्हें “सत्तावादी कदम” बताया। जबकि यूरोप में लागू Digital Services Act या ऑस्ट्रेलिया के Online Safety Act पर वही आक्रामकता दिखाई नहीं दी। यह दोहरा दृष्टिकोण इस बात का संकेत देता है कि सूचकांक का मूल्यांकन समान मानकों पर आधारित नहीं है, बल्कि भू-राजनीतिक और वैचारिक दृष्टिकोण से प्रभावित है।
भारत जैसे देशों के लिए चुनौती केवल रैंकिंग की नहीं है, बल्कि उस मानसिकता की है जिसमें पश्चिमी मॉडल को ही लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अंतिम मानक मान लिया गया है। भारत की सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक विविधता और लोकतांत्रिक अनुभव पश्चिम से भिन्न हैं। यहाँ मीडिया केवल सत्ता-विरोध नहीं, बल्कि समाज-संवेदनशीलता, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक संतुलन का भी प्रश्न है। लेकिन वैश्विक सूचकांक इन जटिलताओं को समझने के बजाय एक तयशुदा उदारवादी ढाँचे में देशों को फिट करने का प्रयास करते हैं।
यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत में आज मीडिया के सैकड़ों टीवी चैनल, हजारों समाचार पोर्टल, क्षेत्रीय भाषाओं की सक्रिय पत्रकारिता और सोशल मीडिया आधारित स्वतंत्र अभिव्यक्ति मौजूद है। सरकार की आलोचना खुले मंचों पर होती है, अदालतें सक्रिय हैं और राजनीतिक बहसें लगातार जारी रहती हैं। यदि यह सब होने के बावजूद भारत को “कम स्वतंत्र” कहा जाता है, तो प्रश्न सूचकांक की निष्पक्षता पर उठना स्वाभाविक है।
निस्संदेह, भारत में पत्रकारिता से जुड़े अनेक गंभीर प्रश्न हैं — मीडिया स्वामित्व, कॉरपोरेट दबाव, फेक न्यूज, राजनीतिक ध्रुवीकरण और पत्रकारों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर निरंतर सुधार की आवश्यकता है। लेकिन इन चुनौतियों का समाधान निष्पक्ष विमर्श से निकलेगा, न कि ऐसे वैश्विक सूचकांकों से जो स्वयं पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के सवालों में घिरे हों।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत केवल पश्चिमी संस्थाओं द्वारा तय नैरेटिव को स्वीकार करने के बजाय अपने लोकतांत्रिक अनुभव और वास्तविकताओं के आधार पर मीडिया स्वतंत्रता का स्वदेशी विमर्श विकसित करे। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की प्रतिष्ठा का निर्धारण गुमनाम विशेषज्ञों की राय से नहीं, बल्कि उसकी जनता के जीवंत लोकतांत्रिक अनुभव से होना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *