
(मनीष चंद्राकर -संपादकीय )
YC न्यूज़ डेस्क। एक सच्चा पत्रकार केवल समाचार नहीं लिखता, वह अपने समय का इतिहास लिखता है। उसकी कलम में केवल स्याही नहीं होती, उसमें समाज की उम्मीदें, जनता की आवाज़ और लोकतंत्र की आत्मा बसती है। जब वह किसी अन्याय के खिलाफ लिखता है, तब सिर्फ एक खबर प्रकाशित नहीं होती, बल्कि हजारों खामोश लोगों को यह भरोसा मिलता है कि उनकी पीड़ा अभी पूरी तरह अनसुनी नहीं हुई है। पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह उन लोगों को आवाज़ देती है, जिनकी आवाज़ सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंच पाती। जब किसी छोटे से गांव की टूटी सड़क राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनती है, जब किसी गरीब को न्याय मिलता है, जब किसी भ्रष्ट व्यवस्था से सवाल पूछे जाते हैं, तब पत्रकार को महसूस होता है कि उसकी कलम अभी जिंदा है और उसका संघर्ष व्यर्थ नहीं गया।
लेकिन हिंदी पत्रकारिता दिवस के इस अवसर पर एक सवाल खुद से भी पूछना चाहिए कि क्या हम उस पत्रकारिता को बचा पा रहे हैं, जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने संघर्ष किया था?
आज पत्रकारिता कई मोर्चों पर लड़ रही है। बाज़ारवाद, राजनीतिक दबाव, टीआरपी की अंधी दौड़, फेक न्यूज़ और सोशल मीडिया के शोर ने इसकी आत्मा को बार-बार घायल किया है। खबरों से अधिक शोर बिक रहा है, तथ्यों से अधिक सनसनी दिखाई जा रही है और विश्लेषण की जगह उत्तेजना ने ले ली है। सबसे बड़ा संकट शायद तकनीक नहीं, बल्कि सोच का है। आज हर गली, हर मोहल्ले और हर चौराहे पर आपको एक “पत्रकार” मिल जाएगा। मोबाइल हाथ में, इंटरनेट जेब में और सोशल मीडिया पर एक पेज तैयार… बस पत्रकारिता शुरू। लेकिन पत्रकारिता केवल सूचना साझा करने का नाम नहीं है। पत्रकारिता जिम्मेदारी है, अध्ययन है, तथ्य की पड़ताल है और सबसे बढ़कर समाज के प्रति जवाबदेही है।
एक नई श्रेणी उन लोगों की भी है जो दूसरों की मेहनत को अपनी उपलब्धि समझ बैठते हैं। किसी की खोजी रिपोर्ट, किसी का विश्लेषण, किसी का लेख… सब कुछ उनके लिए सिर्फ “कंटेंट” है। कॉपी करो, पेस्ट करो, नाम बदलो और प्रकाशित कर दो। न श्रम का सम्मान, न बौद्धिक ईमानदारी का मूल्य। कुछ लोग इससे एक कदम आगे हैं। वे खबर की हेडलाइन बदल देते हैं, दो-चार लाइनें इधर-उधर कर देते हैं और फिर इसे अपनी मौलिक पत्रकारिता घोषित कर देते हैं। उन्हें लगता है कि शब्द बदलने से विचार भी बदल जाते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि नकल कभी सृजन नहीं बन सकती।
पत्रकारिता कोई शॉर्टकट नहीं है। यह एक साधना है। यहां सफलता का कोई डाउनलोड बटन नहीं होता। यहां अनुभव, अध्ययन, संवेदनशीलता और निरंतर अभ्यास ही आपकी पहचान बनाते हैं। यदि आप लगातार पढ़ेंगे, लिखेंगे, समझेंगे और सीखेंगे, तो एक दिन आपकी लेखनी में वह धार जरूर आएगी, जो किसी कॉपी-पेस्ट की मोहताज नहीं होगी।
अगर आप किसी का लिखा साझा करते हैं तो उसका नाम अवश्य दीजिए। यह केवल नैतिकता नहीं, बल्कि उस लेखक और उसके श्रम के प्रति सम्मान है। हर शब्द के पीछे किसी की मेहनत, अध्ययन और समय छिपा होता है।
आज पत्रकारिता के स्तर में गिरावट की बात बहुत होती है। लेकिन यह गिरावट किसी एक संस्था, एक व्यक्ति या एक विचारधारा की वजह से नहीं आई। कहीं न कहीं हम सभी इसके सहभागी हैं। जब तक हम स्वयं आत्ममंथन नहीं करेंगे, तब तक पत्रकारिता की दिशा भी नहीं बदलेगी।
और आखिर में… मैं कई बार सोचता हूं कि पत्रकारिता कोई पेशा नहीं, बल्कि एक ऐसा प्रेम प्रसंग है जिसमें आदमी उम्रभर इंतजार करता रहता है। पत्रकारिता भी अब किसी अधूरी प्रेम कहानी जैसी हो गई है। न मिलने की पूरी उम्मीद बची है, न छोड़ देने की हिम्मत।
फिर भी हम लिखते हैं।
क्योंकि कुछ लोग शराब से बर्बाद होते हैं, कुछ इश्क़ से… और कुछ बेचारे पत्रकारिता से।
लेकिन शायद यही बर्बादी हमारी सबसे बड़ी पूंजी भी है।
क्योंकि जब तक कुछ लोग सच लिखने के लिए बेचैन रहेंगे, तब तक पत्रकारिता जिंदा रहेगी। जब तक कोई युवा पत्रकार किसी दबे हुए सच को सामने लाने का सपना देखता रहेगा, तब तक लोकतंत्र की सांसें चलती रहेंगी।
हिंदी पत्रकारिता दिवस पर उन सभी पत्रकारों को नमन, जो सुविधाओं से नहीं, अपने सिद्धांतों से पहचाने जाते हैं।
जो खबर नहीं, इतिहास लिखते हैं।