
संपादकीय लेख -मनीष चंद्राकर,YC न्यूज़ डेस्क, रायपुर। छत्तीसगढ़ में नए शिक्षा सत्र के संचालन का आदेश जारी हो चुका है और इसके तहत 16 जून से स्कूल खोलने का निर्णय लिया गया है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब प्रदेश भीषण गर्मी और उमस की चपेट में है। उम्मीद की जा रही थी कि मौसम की परिस्थितियों को देखते हुए इस बार स्कूल खुलने की तिथि कुछ आगे बढ़ाई जाएगी, लेकिन रायपुर के वातानुकूलित कमरों में बैठकर निर्णय लेने वाले शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने शायद जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर दिया।
प्रदेश के पालकों में अपने बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर स्वाभाविक चिंता व्याप्त है। जेठ की झुलसाने वाली गर्मी में जब बड़े-बड़े लोग पंखे, कूलर और एसी के बावजूद राहत महसूस नहीं कर पा रहे हैं, तब हजारों बच्चे सरकारी स्कूलों में किस तरह दिन बिताएंगे, यह बड़ा सवाल है। प्रदेश के अनेक सरकारी विद्यालय आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं। कहीं पंखे नहीं हैं, कहीं बिजली की व्यवस्था कमजोर है और कहीं भवनों की हालत ऐसी है कि गर्मी में वे भट्ठी का रूप ले लेते हैं।
प्री-मानसून की कुछ हल्की बारिश को यदि मौसम सामान्य होने का संकेत मान लिया गया है तो यह भी एक बड़ी भूल है। छत्तीसगढ़ में वास्तविक राहत मानसून के सक्रिय होने के बाद ही मिलती है। फिलहाल मानसून के आगमन को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे में बच्चों को तपती गर्मी और उमस भरे वातावरण में स्कूल भेजना उनके स्वास्थ्य के साथ अनावश्यक जोखिम लेने जैसा है।
शिक्षा का महत्व अपनी जगह है, लेकिन शिक्षा का उद्देश्य बच्चों का सर्वांगीण विकास है, न कि उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में धकेलना। यदि कुछ दिनों की देरी से स्कूल खुलते हैं तो इससे शिक्षा व्यवस्था पर कोई गंभीर प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन तेज गर्मी के कारण किसी बच्चे की तबीयत बिगड़ती है तो उसकी भरपाई संभव नहीं होगी। सरकार और शिक्षा विभाग को यह समझना होगा कि कैलेंडर का पालन करने से अधिक महत्वपूर्ण बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य है। निर्णय लेते समय फाइलों और आंकड़ों के साथ-साथ मौसम की वास्तविक स्थिति और अभिभावकों की चिंताओं को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
संयोग से आज पूरा प्रदेश शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव को जन्मदिन की बधाइयाँ देने में जुटा हुआ है। ऐसे शुभ अवसर पर प्रदेशवासियों को उनसे एक संवेदनशील निर्णय की अपेक्षा करने का पूरा अधिकार है। यह उम्मीद की जा सकती है कि वे लाखों स्कूली बच्चों के स्वास्थ्य और अभिभावकों की चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए स्कूल खुलने की तिथि पर पुनर्विचार करेंगे। बच्चों के हित में यदि दस दिन की राहत दी जाती है तो यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि संवेदनशील नेतृत्व का परिचायक होगा।
अभी भी समय है। राज्य सरकार को इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए और मौसमी प्रतिकूलताओं को देखते हुए स्कूल खुलने की तिथि कम से कम दस दिन आगे बढ़ानी चाहिए। मानसून की दस्तक के बाद वातावरण अपेक्षाकृत अनुकूल हो जाएगा और बच्चे भी स्वस्थ एवं सुरक्षित माहौल में नए सत्र की शुरुआत कर सकेंगे। आखिरकार सवाल सिर्फ स्कूल खोलने का नहीं, बल्कि प्रदेश के लाखों नौनीहालों के स्वास्थ्य और भविष्य का है। सरकार को यह तय करना होगा कि उसके लिए अधिक महत्वपूर्ण क्या है—एक प्रशासनिक तिथि या बच्चों की सुरक्षा?