
मनीष चंद्राकर -संपादकीय /रायपुर। तस्वीरें कभी-कभी शब्दों से ज्यादा सशक्त होती हैं। अंबिकापुर कोतवाली से सामने आई दो तस्वीरें इसी सच को फिर साबित करती हैं। एक ही थाना, दो आरोपी—लेकिन कार्रवाई का अंदाज़ अलग-अलग। सवाल उठना स्वाभाविक है, और जरूरी भी।
पहली तस्वीर में एक कथित हिस्ट्रीशीटर आरोपी बिना पुलिस उपस्थिति के सहज मुद्रा में बैठा नजर आता है। यह दृश्य सामान्य पुलिस प्रक्रिया की उस परिभाषा से मेल नहीं खाता, जिसमें आरोपी को विधिवत हिरासत और निगरानी में दिखाया जाता है। दूसरी ओर, दूसरी तस्वीर में आरोपी पुलिसकर्मियों के बीच खड़ा है—एक औपचारिक, स्थापित और अपेक्षित प्रक्रिया के अनुरूप।
यहीं से शुरू होता है असल सवाल—क्या यह सिर्फ तस्वीरों का फर्क है, या फिर व्यवस्था के भीतर मौजूद किसी असमानता की झलक? क्या कानून का व्यवहार व्यक्ति के आधार पर बदलता है? या फिर यह महज संयोग है, जिसे बढ़ा-चढ़ाकर देखा जा रहा है? मामले को और गंभीर बनाता है पत्रकार पंकज शुक्ला के साथ हुई मारपीट का संदर्भ। जब किसी पत्रकार पर हमला होता है, तो वह सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी प्रहार होता है। ऐसे में, यदि आरोपियों के साथ अलग-अलग व्यवहार की आशंका बनती है, तो यह चिंता का विषय है।
पुलिस व्यवस्था का मूल आधार निष्पक्षता और समानता है। “कानून सबके लिए बराबर है”—यह सिर्फ एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव है। यदि व्यवहार में इसका उलट नजर आता है, तो भरोसा डगमगाने लगता है।
यह जरूरी है कि पुलिस प्रशासन इन सवालों पर स्पष्ट और पारदर्शी जवाब दे। यदि प्रक्रियाओं में कोई चूक हुई है, तो उसे स्वीकार कर सुधार किया जाए। और यदि तस्वीरें भ्रम पैदा कर रही हैं, तो सच्चाई सामने लाई जाए। क्योंकि अंततः सवाल सिर्फ दो आरोपियों का नहीं है—सवाल उस भरोसे का है, जो आम नागरिक कानून और व्यवस्था पर करता है।