कुर्सी गई तो पीड़ा बढ़ी, पर क्या स्कूलों को अब असली मालिक मिल गए हैं ? शाला विकास समितियों से नेताओं की विदाई पर एक संपादकीय दृष्टि

कुर्सी गई तो पीड़ा बढ़ी, पर क्या स्कूलों को अब असली मालिक मिल गए हैं ? शाला विकास समितियों से नेताओं की विदाई पर एक संपादकीय दृष्टि

मनीष चंद्राकर @ YC न्यूज़ डेस्क। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा शाला विकास समितियों (एसएमडीसी) को समाप्त कर नई स्कूल प्रबंधन समितियों (एसएमसी) के गठन का निर्णय केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह स्कूलों की सत्ता संरचना में बड़ा परिवर्तन है। अब समितियों में 75 प्रतिशत सदस्य अभिभावक होंगे और अध्यक्ष भी उन्हीं में से चुना जाएगा। पहली नजर में यह शिक्षा के लोकतंत्रीकरण की दिशा में उठाया गया कदम लगता है, लेकिन इसके सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं।

सवाल यह नहीं है कि नेता स्कूल समितियों में रहें या न रहें। असली सवाल यह है कि क्या इस बदलाव से स्कूलों का विकास अधिक प्रभावी होगा, या फिर वर्षों से बनी एक स्थानीय भागीदारी की परंपरा कमजोर पड़ जाएगी?
यह सच है कि बीते वर्षों में शाला विकास समितियां कई जगह राजनीतिक नियुक्तियों का माध्यम बन गई थीं। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद अक्सर स्थानीय नेताओं, विधायक प्रतिनिधियों, सांसद प्रतिनिधियों या प्रभावशाली कार्यकर्ताओं को मिलते थे। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इन्हीं पदों के माध्यम से अनेक लोगों ने स्कूलों के लिए संसाधन जुटाए, अधिकारियों के दरवाजे खटखटाए और जनप्रतिनिधियों तक स्कूलों की समस्याएं पहुंचाईं।

गांवों में स्कूल केवल शिक्षा का केंद्र नहीं होता, वह सामाजिक प्रतिष्ठा का भी केंद्र होता है। 15 अगस्त और 26 जनवरी को झंडा फहराना, वार्षिक उत्सव में मंच साझा करना, बच्चों को पुरस्कार देना और स्कूल के विकास में अपनी भूमिका दिखाना—ये सब स्थानीय नेतृत्व को समाज से जोड़ने का माध्यम बनते थे। कई लोगों ने निजी संसाधनों से स्कूलों को कूलर, अलमारी, कुर्सियां, पेयजल सुविधा और अन्य सामग्री उपलब्ध कराई। बदले में उन्हें कोई वेतन नहीं मिलता था, केवल सम्मान और पहचान मिलती थी। नई व्यवस्था ने यह सम्मानजनक भूमिका एक झटके में समाप्त कर दी है। इसलिए स्वाभाविक है कि अनेक लोग इसे अपने सामाजिक वजूद पर चोट के रूप में देख रहे हैं।

लेकिन इस फैसले का दूसरा पक्ष भी है। स्कूल आखिरकार बच्चों और अभिभावकों के लिए होते हैं, नेताओं के लिए नहीं। यदि किसी बच्चे की पढ़ाई प्रभावित होती है, यदि स्कूल में शिक्षक नहीं हैं, यदि भवन जर्जर है या मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता खराब है, तो सबसे ज्यादा असर अभिभावकों पर ही पड़ता है। ऐसे में स्कूल प्रबंधन का अधिकार भी सबसे अधिक उन्हीं के पास होना चाहिए। केंद्र सरकार की नई गाइडलाइन भी इसी सोच पर आधारित है कि स्कूलों के संचालन और निगरानी में माता-पिता की भागीदारी बढ़ाई जाए। जब निर्णय लेने की शक्ति सीधे अभिभावकों के पास होगी, तो जवाबदेही भी बढ़ेगी। अब मरम्मत कार्यों से लेकर बच्चों की उपस्थिति और स्कूल विकास योजना तक में अभिभावकों की भूमिका प्रमुख होगी।

फिर भी सरकार को यह समझना होगा कि समाज और स्कूल के बीच पुल का काम करने वाले स्थानीय नेतृत्व को पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं बनाया जा सकता। यदि कोई जनप्रतिनिधि या सामाजिक कार्यकर्ता स्कूल के विकास में योगदान देना चाहता है, तो उसके लिए भी सम्मानजनक भूमिका तय होनी चाहिए। लोकतंत्र में सहभागिता का अर्थ केवल अधिकार देना नहीं, बल्कि सहयोग की संभावनाओं को भी बनाए रखना है।
अंततः यह फैसला सही है या गलत, इसका मूल्यांकन समय करेगा। लेकिन इतना तय है कि अब स्कूलों में राजनीति की पकड़ कमजोर होगी और अभिभावकों की भूमिका मजबूत होगी। चुनौती यह है कि कहीं नेताओं की विदाई के साथ वह सामाजिक ऊर्जा भी समाप्त न हो जाए, जिसने कई स्कूलों को संसाधन और पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

आज कुछ लोग इस बदलाव को शिक्षा में लोकतंत्र की जीत बता रहे हैं, तो कुछ इसे स्थानीय नेतृत्व के अपमान के रूप में देख रहे हैं। सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं खड़ी है।
क्योंकि स्कूलों को नेताओं की नहीं, नेतृत्व की जरूरत होती है — और नेतृत्व किसी पद या कुर्सी का मोहताज नहीं होता।
✍️ मनीष

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